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तीज - सावन का त्यौहार
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आज फिर याद आ गई मुझे मेरे गांव की तीज



सामण का महीना लगते ही गांव में जिस तरह के रुनक-झुनक देखने को मिलती थी आज वह फिर से ताजा हो उठी। छोटे-छोटे बच्चे तीज से पहले ही बैठकों एवं पेड़ों में झूले ड़ाल लेते थे और गीत गाते थे मेरी पींघ तलै लांडा मोर नाच्चै..। इसके साथ ही गांव में महिलाएं अपना काम-काज निपटाकर रात को गीत गाते हुए झूले झूलती थी।

उनके गीतों से पनपी स्वर लहरियां आज भी कानों में गूंज रही हैं। महिलाओं में एक दूसरे से ऊपर पींघ ले जाने की होड़, सासू का नाक तोडऩा जैसी घटनाएं झूला झूलती महिलाओं की उमंग के प्रतीक के रूप में आज फिर से मानस पटल पर अंकुरिम हो उठी हैं। सामण के महीने झड़ी एवं बूंदाबांदी के बीच में घर में चुल्हे पर मिट्ठी रोटी पकाना, सुहाली, गुलगुलों एवं पूड़ों की महक से पूरी गली सरोबार हो उठती थी। हम सभी बच्चे अकसर ये गीत गाया करते थे ताते-ताते पूड़े कर दे री मां, हाथ जलै मूंह मीट्ठा री मां..।

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अचार के साथ पूड़ों का स्वाद ही कुछ और है। तीज से पहले गांव के गोरे पर लगे पेड़ों पर टहने रोकने की परम्परा ग्रामीण आंचल की ऐसी घटना हुआ करती थी जिससे युवाओं में जोश एवं उमंग का भाव देखने को मिलता था। साथ ही तीज के दिन छोटे बच्चे सुबह से ही अपने नेज्जू एवं पाटड़ी लेकर यथा स्थान पर पहुंच जाते थे। उधर भाभियों को झुलाने के लिए युवाओं की मंडली भी पंझाली ड़ालने के काम में जुट जाया करती थी। इस प्रकार दोपहर के समय महिलाओं के गीत गाते हुए समूह झूलने के लिए आया करते थे।

महिलाओं का सज-धज कर झूलने के लिए जाना वास्तव में ग्रामीण संस्कृति का ऐसा सौन्दर्य रहा है संभवत आज भी है कि इस दृश्य को देखने मात्र से ही ग्रामीण संस्कृति की आभा पर गौरवानुभूति होती है। और फिर देवरों द्वारा भाभियों को झुलाने की परम्परा का सिलसिला इस उमंग से शुरू होता था जो शाम होने तक चलता था। इसके साथ वहां पर बैठ बुजुर्ग, महिलाएं सभी जन आनन्द का ऐसा वातावरण पैदा करते थे जिसकी ग्रामीण खुशबू आज भी भावों को रोमांचित कर देती है।

पाटड़े एवं पंझाली पर झुलाते हुए देवरों एवं भाभियों का ऐसा मुकाबला जिसमें मजाक भी होता था और जीतने की जिद भी। अनेक भाभियों की आवाज झूले की उंचाई पर जाते हुए गीत गाते-गाते कम्पन पैदा होने पर देवरों को जिस आनन्द की अनुभूति होती थी वह वास्तव में किसी ब्रह्मबुटी से कम नहीं था। इसके पश्चात तो देवरों द्वारा और हांग भरना झूलों को और अधिक ऊंचाई तक ले जाना भाभियों के गीतों में डऱ से कम्पन पैदा करने की होड़ वास्तव में जीत का ऐसा अहसास था जिसका जिक्र साल भर चलता था। एक बार जब पाटड़ा ड़ला हुआ था। देवर-भाभियों को झुला रहे थे। झूला अपने यौवन पर था।

ऐसे में रस्सा टूट गया और उसके पश्चात जो दृश्य पैदा हुआ वह वास्तव में किसी अद्वितीय रोमांच से कम नहीं था। भगवान की दया से किसी को ज्यादा चोट नहीं आई लेकिन उस दृश्य का बिम्ब आज भी मन-मस्तिष्क में उभरता है तो रोएं खड़े हो जाते हैं। इस प्रकार सुबह से लेकर शाम तक झूलों की जो बयार आती थी उसी की प्रेरणा है के हम आज फिर से तीज का त्योहार मना रहे हैं।

आज वो पेड़ रहे ना पींघ तीज के भी दिन होए पुराने




तीज उत्तर भारत और खासकर हरियाणा का एक विशेष त्यौहार है। यह त्यौहार विशुद्ध रूप से प्रकृति और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अन्य त्यौहार में कुछ ना कुछ धर्म का अंश मिला होता है। जब वर्षा से सारी धरा सरोबार होती है चारों और हरियाली की छटा होती है तो मानव मन भी मयूर की तरह हर्षित हो कर नृत्य को आतुर होता है। देखा जाए तो त्यौहार की शुरुआत सी हो जाती है तीज से और होली पर खत्म। इसीलिए कहा भी जाता है

आयी तीज बिखरेगी बीज, आयी होली भर ले गयी झोली।

हरियाणा में तीज विशेष रूप से मनाया जाता रहा है। इस त्यौहार पर बहन बेटियों के पास “कोथली” जरूर भेजी जाती है। यह परंपरा कालांतर से चली आरही है। पहले कोथली में घर के बने मीठे पकवान और बहन बेटी के लिए कपड़े लत्ते भेजे जाते थे। मीठे पकवानों में सुहाली, गुलगुले, मीठी मट्ठी आदि होती थी। लोकगीत में भी कहा जाता था

" मीठी तै करदे री मां कोथली जाना बहन के देण, पपहिया री बोल्या पिपली "

समय से साथ कोथली भी बदलती गयी। घर के बने मीठे पकवानों का स्थान घेवर, पातसे ने ले लिया। बहन बेटी बड़ी शिद्दत से इंतजार करती थी कि कब कोथली आएगी उसकी। माँ बाप भाई भाभियों की भी यही इच्छा रहती थी कि कोथली जरूर पहुचाई जाए। अगर किन्ही मजबूरी वस कोथली नहीं पहुँच पाती तो बहन बेटी को बहुत ही बुरा लगता था और इस बात की भी टुकाई हो जाती थी कि फलानी की कोथली नहीं आयी। ये कोथली सिर्फ खानपान की चीजें या लत्ते कपड़े ना होकर एक प्रेम और सम्मान का सूचक होता था बहन बेटी के लिए। चाहे लड़की कितने ही बड़े पद पर हो किसी चीज की कमी नही हो वो भी इंतज़ार में रहती है कोथली की। कोथली में मायके का जो प्यार और दुलार आता है उसका कोई मुकाबला नहीं।

आज भी चाहे आदमी कितना भी गरीब हो उसकी कोशिश होती है कि अपनी हैसियत के हिसाब से बहन बेटी की कोथली जरूर पहुचाई जाए। वैसे तो पुरे सावन के महीने में झूला झूला जाता रहा है लेकिन तीज को खुलने का अलग ही उत्साह और उमंग होती है। सुबह से ही गाँव के बाहर बड़, पीपल, नीम, कीकर आदि के बड़े बड़े पेड़ो पर झूल डाल दी जाती थी। लडकिया, बहुवें सब नए कपड़े पहन कर गीत गाती हुई झूलने को जाती थी। नई आयी हुई बहु विशेष आकर्षण होती थी उस दिन। चारो और झूल ही झूल होती थी। उसी का वर्णन सूर्यकवि लख्मी चंद ने एक रागनी में किया है,

" चौगरदे के बाग हरा घन घोर घटा सामाण की छोरी गावै गीत सुरीले झूल घली कामण की "

झूलते हुए गीत गाती रहती थी।पींघ इधर से उधर और ऊंचे से ऊंचे होती रहती थी। जब तक हाथ बढ़ा कर पेड़ की टहनियों से पत्ते ना तोड़ लेती तब तक लगता ही नही था कि झूली भी हैं। इस पेड़ से पत्ते तोड़ने वाली बात को “सासु का नाक तोड़ना” का नाम दिया जाता था। देवर भी अपनी भाभियों को झुलाने को आतुर रहते थे। भाभी पींघ पर और देवर के हाथ मे लश्कर। दोनो में जिद। देवर की ये जिद की भाभी को पींघ पर चक्कर आने लगे और वो पींघ को रोकने की कहे। भाभी को ये जिद की देवर ही हार मान कर पींघ को रोक दे। हार मानने को कोई भी तैयार नहीं। इसी तरह कई गीत गा लेती औरतें पींघ पर झूलते झूलते। देवर भी थकावट महसूस करने लग जाता है। भाभी को भी पींघ पर बैठे बैठे चक्कर आने लगते हैं। भाभी को पता है देवर की हालत का और यह भी जानती है कि वो हार नहीं मानेगा। आखिर में भाभी ही अपना बड़प्पन दिखाती है और कहती है देवर रोक दे पींघ ने घिरणी चढ़ण लागगी। इसी प्यार और शर्म से पूरा दिन लोग लुगाई झूलते रहते थे। आज ना वो पेड़ रहे ना वो पींघ

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आज वो पेड़ रहे ना पींघ तीज के भी दिन होए पुराने




हाँ, माँ सावन में हर साल भेजती है कोथली में बाँध कर जरा सा सावन। घेवर, कपड़े, चूड़ी, मेहँदी, सुहाली, हथेली जितने बड़े पताशे, कसार और गाँव से आती जरा सी भीगी महक। यूँ तो भाई की सूरत देख हर बहन सावन हो जाती है। पर मायके की गली का सावन कभी भूल ही नहीं पाती। सावन के आते ही मन की रस्सियाँ पीहर के बागों में पींग डालती हैं। वे मोर, कोयल की आवाजें, कौओं के नीम के ऊपर पहरे, सहेलियों की टोली, प्लास्टिक के सप्रिंग वाली चूड़ियाँ, नन्ही हथेली पर मेहँदी की चित्रकारी, कंधे पर रस्सी और हाथ में सीढ़ी के नजारे याद करती हैं सावन की तीज सिर्फ छुट्टी का दिन नहीं था। बहुत बड़ा त्योहार था।

बाबुल तुम्हारे गाँव में मेरे नीम, कीकर, झूले छूट गए। वे साँप की छतरियाँ और खुम्भी की खूबसूरती छूट गयी। बारिश में उगे मुट्ठी में बंद जरा मिट्टी में दबाए हुए नीम के नन्हे बच्चे छूट गए। आम की दबायी गुठलियों के उग आने का उतावलापन छूट गया। बारिश के बाद कीचड़ में जानबूझकर पैर गंदे करना छूट गया। तुम कोथली के साथ सब भिजवा देना।

मुझे बहुत याद आता है, वह गली के गड्ढों में भरा हुआ पानी और नंगे पैरों का उछलना, कड़कती बिजली और आँगन में बहाने बनाकर जाना, जानबूझकर फिसलना। माँ बाबा की आवाजें अभी भी कानों में गूंजती हैं। “बारिश में मत नहा, बीमार हो जाएगी।” पर बारिश बुरी नहीं लगती थी। कच्चे घर की टपकती छत्त भी यूँ लगती जैसे घर में कोई नयी खुशी फूट पड़ी है। पूरी गली में चप्पल हाथ में लेकर चलना शान की बात लगती । बारिश के बाद पेड़ों को हिलाना तो सबसे पसंदीदा काम होता। दूसरे के ऊपर डाली हिलाना, उसे गीला करके भागना तो ओर भी मजेदार लगता। एक सुनहरी लड़की मायके जाना चाहती है। चलो! सब चलते हैं। अपने पीपल के पेड़ और जोहड़ के किनारों पर।

जोहड़ के किनारे वाले पीपल पर सावन गाते हुए झूलेंगे। झूलते- झूलते जोहड़ में गोता लगाएँगे। कीकर की कच्ची कोपल फूट चुकी होंगी। नीम निम्बोलियों से झुक गए होंगे। बस हमारी ही तो कमी है। आधे पेड़ तो कट चुके होंगे। फिर भी जाने का मन तो है ही। जैसे घर की रोटी रिटायर होने के दौर में है, वैसे ही तीज का त्योहार चलन से बाहर है। पर मेरा मन नहीं मानता कि मैं छत्त पर खड़े लोहे के झूले पर शगुन सा झूल लूं। मुझे तो बाड़े भीतर खड़े नीम की गोदी में झूलना है। पेड़ पर चढ़ कर कौवे की चोंच से डर कर झूला डालना है। उस मोटी कीकर पर झूल डालनी है जिसकी झूल की रस्सी मेरी हथेली में नहीं समाती। जिसकी ऊँचाई मुझे तारों को पैर का अंगूठा लगाने से जरा सी दूर लगती है।

मैं झूलती रहूँ और बारिश मुझ पर मोतियों सी बरसती रहे। गली में ठहरा पानी मुझे आवाज दे कि गोरी पगथलियों से हमें छपाकों में बाँट दो। फिसलती मिट्टी मेरे पैरों को बढ़ने ही न दे। मेरा एक पैर खींचकर कुरते पर नया डिजाइन बना दे। निम्बोलियाँ मुझसे कहें कि हमें चख कर अपना मुँह बिचका लो और गुठलियों को अपनी सहेलियों पर फेंक दो। बारिश मुझे कहे ,भीतर मत रह गली के बच्चे बरसाती पतनाल के नीचे बाल्टी भर रहे हैं, तुम भी भर लो। सुबह होते ही सहेलियाँ मुझे आवाज दें, “आ जा झूल डालनी है।” मैं जिद्द करूँ कि पहले मुझे ही झूलना है। कीड़ी भी मुझे ही झुलानी है। पेड़ पर चढ़कर काट वाला पत्ता भी मुझे ही लगाना है। मुझे तब तक झूलना है, जब तक सहेली अपनी रस्सी न माँगने लग जाए। मुझे तब तक झूलना है, जब सारी सहेलियाँ कह कह कर दूर थक जाएँ और कहें कि हम घर जा रही हैं। मुझे तब घर लौटना है जब पेड़ों के सोने का वक्त हो जाए और घरों से कढाही में खोलती सुहालियों की खुशबू न आने लगे।