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कोथली का जायका
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पुंडरी (कैथल) की फिरणी vs रोहतक का घेवर


सावन(सामण) का महीना हो और घेवर और फिरणी की बात ना हो ये संभन नहीं है। सावन का सबसे खास व्यंजन है घेवर और फिरणी अधिकतर लोग सावन में इसे खाना पसंद करते हैं. बरसात के मौसम में कई तरह के व्यंजन बनते हैं लेकिन घेवर और फिरणी की बात की कुछ अलग है. यह मैदे से बना, मधुमक्खी के छत्ते की तरह दिखाई देने वाला एक खास्ता और मीठा पकवान है. वैश्वीकरण के दौर में आज घेवर भी कई रूपों में बनने लगा है सावन के महीने में घेवर और फिरणी की खुशबू पूरे बाजार को महका देती है और तीज व रक्षाबंधन के अवसर पर मिठाई की दुकानों पर भीड़ देखते ही बनती है. सावन में तीज के अवसर पर बहन-बेटियों को सिंदारा देने की परंपरा काफी पुरानी है, इसमें चाहे कितना ही अन्य मिष्ठान रख दिया जाए लेकिन घेवर या फिरणी होना अवश्यक होता है. इसलिए साल के विशेष समय पर बनने वाली इस पारंपरिक मिठाई का वर्चस्व टूटना संभव नहीं है, भले ही आधुनिक मिठाइयों के सामने इसकी लोकप्रियता में कुछ कमी दिखाई देती हो. हरियाणा में सदियों से चली आ रही है कोथली की परम्परा। सावन का मास में हर किसी महिला को सबसे ज्यादा इंतजार अपने पीहर से आने वाले कोथली का होता है। प्राचीन काल से चली आ रही मान्यता के अनुसार शादी के बाद लड़की का पहला सावन अपने मायके पक्ष में बिताना आवश्यक होता है। सावन में चाहे बस हो या मैक्सी कैब हर वाहन में कोथली वालों का बोल-बाला होता है।

सावन शुरू होते ही धीरे-धीरे शुरू हुई कोथली परम्परा, तीज उत्सव के समीप आते-आते पूरे यौवन पर पहुंच जाती है। वैसे तो यह सिलसिला पूरा सावन मास चलता रहता है। परंतु तीज उत्सव के बाद यह रस्म ज्यादातर वृद्ध महिलाओं के परिजनों द्वारा ही पूरी की जाती है। नव-यौवना व अन्य महिलाएं कोथली को तीज से पहले ही पसंद करती है। वृद्ध महिला रामरति, कृष्णा, ज्ञान चंद, भतेरी, प्रकाशों ने बताया कि उनके जमाने में कोथली में दिए जाने वाले अधिकतर पकवान घर पर ही पूरी शुद्धि के साथ तैयार किए जाते थे। परंतु आजकल तो कोथली के पकवान के नाम पर बाजार में ज्यादातर घटिया पकवान बनाए जाते है।

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पुंडरी(कैथल) की फिरनी



"पूंडरी की मशहूर फिरनी" यही वो स्लोगन है जिसको लगाकर पूरे हरियाणा के शहरों में दूकानदार इस मिठाई को बेचते हैं। सावन के महीने में लोगों को पूंडरी का नाम लेने भर से ही फिरनी का स्वाद याद आने लगता है। पूंडरी हरियाणा के कैथल जिले का एक छोटा सा कस्बा है। यहां की बनी एक मिठाई हरियाणा तो क्या बल्कि पूरे भारत में मशहूर है, जिसका नाम है फिरनी। ये मैदे और घी से बनी एक ऐसी मिठाई है जो की सिर्फ पूंडरी में ही बनती है और पूरे हरियाणा समेत अनेक जगहों पर सप्लाई की जाती है। सावन का महीना आने से लगभग 1 महीना पहले ही यहां के कारीगर फिरनी बनाना शुरू क्र देते हैं। बड़ी लंबी और कड़ी मेहनत करके कारीगर इसको तैयार करते हैं। कारीगर की मेहनत और लगन ही है जिसने इस मिठाई को इतना मशहूर कर दिया हैं। सावन के महीने में इस मिठाई के बड़े बड़े स्टाल और गोदाम देखने को मिल सकते हैं। सावन का महीना लगते ही यहां के स्थानीय लोगों के रिश्तेदारों के फोन आने लग जाते है मिठाई मंगवाने के लिए। कैथल, करनाल, जींद, पानीपत आदि शहरों में दुकानों पर पूंडरी की मशहूर फिरनी के बैनर लगे देखे जा सकते हैं, जो की यहां से ले जाकर फिरनी बेचते है। /p

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1936 में फतेहपुर से फिरनी बनाने की शुरुआत हुई थी

वैसे तो हरियाणा के कई शहरों समेत कैथल पुंडरी में जगह-जगह प्रसिद्ध फिरनी के बोर्ड मिठाई की दुकानों के बाहर लगे मिल जाएंगे, लेकिन फिरनी की सबसे पहले और प्रसिद्ध दुकान पुंडरी के साथ लगते फतेहपुर गांव के बीचोंबीच रिहायशी इलाके में व्यास मिठाई के नाम से है जहां पर 1936 में पहली बार इसकी शुरूआत हुई थी। फतेहपुर गांव से संबंध रखने वाले स्वर्गीय हरिकिशन ब्यास ने 1936 में फिरनी बनाने की शुरुआत की थी। गांव के बीच में छोटी सी दुकान से उन्होंने इस कार्य की शुरुआत की थी, जो धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में काफी मशहूर हो गई थी। उस समय में उनके अलावा कोई भी फिरनी नहीं बनाता था। अंग्रेज अधिकारी भी उनकी बनाई फिरनी को काफी पसंद करते थे। गांव में आज भी कोई घर ऐसा नहीं होगा जिस घर में मेहमानों के लिए फिरनी न रखी हो। अब तो पूंडरी में लगभग 30 दुकानों पर फिरनी बनाने का कार्य चलता है।

शुरू में एक-दो दुकानों से ही ये मिठाई बननी शरू हुई थी लेकिन अब यहां पर सैकड़ों दुकाने हैं जो फिरनी को तैयार करते है। बताया जाता है की यहां जैसी फिरनी कहीं भी नही बनती। कारीगरों का कहना है की यहां के पानी में शोरे की मात्रा की वजह से वो बात है जो इस मिठाई को खास बनाती है। कुछ कारीगरों का तो यहां तक कहना है की ये वरदान ही है जो ऐसी मिठाई सिर्फ पूंडरी में ही बनती है कहीं और नही। जब स्थानीय लोगों और खरीददारों से बात की गई तो उन्होंने बताया की ये मिठाई वो अपने सभी रिश्तेदारों को पूरे भारत में भेजते हैं। कुछ ने तो विदेशों में भी भेजने की बात कही। इसको यहां सावन के फल के नाम से भी जाना जाता है। सावन का यह फल सावन के मौसम में खूब अच्छे से फल-फूल कर लोगों को एक अद्भुत स्वाद की अनुभूति कराता रहता है। कारीगरों का कहना है कि यहां की फिरनी का छोटा साइज और मुलायमपन है जो इसे अन्य शहरों की फिरनी से इसे अलग करती है। यहां की फिरनी में वो अद्भुत स्वाद है जो खाने वालों को बार बार अपनी और आकर्षित करती है। ग्राहकों और स्थानीय निवासियों ने बताया की यहां की फिरनी के चर्चे तो विदेशों तक हैं।

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फिरनी के लिए विदेशों से रिश्तेदारों के आते हैं फोन

जब भी सावन का महीना आता है तो इसके लिए देश की कई जगहों से ही नहीं विदेशों से भी उनके रिश्तेदारों के फोन आने लगते हैं। सावन के महीने में हरियाणा में तीज के दिन बेटी या बहन के घर कोथली( संधारा) में फिरनी ले जाई जाती है, जिसे लोग बड़े ही चाव से खाते हैं। अन्य शहरों जैसे कैथल, करनाल, पानीपत, यमुनानगर, जींद आदि से आए व्यापारी जो पूंडरी से फिरनी ले जाकर बेचते हैं उनका भी ये कहना है की उनके शहर के ग्राहकों को भी सिर्फ पूंडरी की फिरनी ही चाहिए। सावन की बस यही एक मिठाई है जिस पर लोगों की नजरें आकर टिक जाती है। फिरनी बनाने वाले हलवाइयों ने बताया कि फीकी फिरनी को एक महीना पहले ही बनाना शुरू कर देते हैं और जैसे-जैसे उन्हें थोक में आॅर्डर मिलते हैं, वैसे-वैसे फीकी फिरनी पर मीठा चढ़ाकर बेचा जाता है। पूंडरी ही एक ऐसा इलाका है, जिसके पानी में शोरा नहीं होता इसलिए फिरनी का स्वाद अच्छा होता है। पूंडरी क्षेत्र के 4.5 किलोमीटर दायरे के बाहर पानी में शोरे की मात्रा होने के कारण फिरनी का स्वाद लजीज नहीं बन पाता। यही कारण है कि पूंडरी में बनाई गई फिरनी पूरे भारत में मशहूर है। पूंडरी के हलवाइयों द्वारा बनाई गई फिरनी एक महीने तक खराब नहीं होती। क्षेत्र व आसपास के जिलों से बाहर विदेशों में गए लोग भी फिरनी ले जाना और भेजना नहीं भूलते हैं। इस बार कोरोना वायरस का असर भी इस धंधे को काफी प्रभावित कर रहा है। प्रधान रघुबीर ने बताया कि हर वर्ष की अपेक्षा इस बार फिरनी की बिक्री में कमी आई है, जबकि हलवाई पूरी सावधानी का पालन करते हुए फिरनी तैयार कर रहे हैं।

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Panoromic 360 view of Famous Vyas sweet shop.
Panoromic 360 view of Famous Vyas Sweet Shop inner view.

रोहतक का घेवर


बात जब रोहतक की हो तो यहां के घेवर का नाम आते ही मुंह मे पानी आ जाता है। रोहतक के घेवर की मिठास विदेशों तक फैली हुई है। सावन के महीने मे रोहतक के बाजार घेवर की खुशबू से महक उठते हैं। तीज व रक्षाबंधन नजदीक आने से घेवर की दुकानों पर भीड़ देखते ही बनती है। रोहतक के श्री कृष्णा वाला घेवर की डिमांड हरियाणा ही नही बल्कि देश-विदेश तक इन दिनों बनी रहती है। विदेशों मे रहने वाले रोहतक व हरियाणा के नागरिक अक्सर अपने परिजनों से घेवर विदेश मे मंगवाते हैं। जिसमें सामान्य से लेकर मावा घेवर, मलाई घेवर, पनीर घेवर, दुध घेवर आदि शामिल है।

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रोहतक में इन दिनों चारों तरफ घेवर की महक छाई हुई है. रोहतक का बड़े बाजार जो अपनी मिठाईयों के लिए देश भर मे मशहूर है। ये बाजार कभी राजे महाराजों के समय से चला आ रहा है। यहां पर अधिकतर मिठाई की पुश्तैनी दुकान हैं। जो 150 साल से भी पुरानी हैं। बाजारों में लोग जमकर घेवर की खरीदारी कर रहे हैं. सावन का महीना होने के कारण और तीज त्यौहार के चलते लोग अपने लिए और अपने रिश्तेदारों के लिए इसे चाव से खरीदते हैं. एक अनुमान के मुताबिक महज तीन महीने के सीजन में अकेले रोहतक में हजारों टन घेवर की बिक्री हो जाती है. रोहतक में घेवर की 33 वैरायटी बनती हैं, जिसमें से मलाई वाला, पनीर वाला और मावे वाला लोग खूब पसंद करते हैं. वहीं, घेवर खरीदने वाले लोगों का कहना है कि रोहतक का घेवर बहुत मशहूर है, इसलिए विदेशों में रहने वाले रिश्तेदार भी इसकी मांग करते रहते हैं, जिनको वो लगातार भेजते हैं. हालांकि कुछ की शिकायत भी थी कि कूरियर से घेवर भेजने की व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण वे अपने रिश्तेदारों को घेवर नहीं भेज पा रहे.अलग-अलग वैरायटी होने के कारण इसके भाव भी अलग-अलग हैं. आमतौर पर अच्छी क्वालिटी का घेवर औसतन 300 से 600 रूपए किलो मिलता है. घेवर का काम करने वाले रोहतक के एक दुकानदार ने बताया कि उनके यहां से देश के अलग-अलग हिस्सों में घेवर की सप्लाई होती है, लोग यहां से खरीदकर अपने रिश्तेदारों को भेजते हैं.

घेवर का व्यवसाय केवल जुलाई और अगस्त दो महीने तक रहता है। लेकिन इसके अलावा मिठाई की विभिन्न किस्में भी बनाई जाती हैं। हालांकि घेवर के खरीदार दिनभर आते रहते हैं। लेकिन शाम के समय उनकी दुकान पर ज्यादा भीड़ रहती है। देशी घी के घेवर की कीमत 400 से शुरू होकर 600 रूपये तक जाती है। दीपक अग्रवाल ने बताया की ये दुकान उनके दादा गोपीराम ने 1992 मे रोहतक के शीला बाईपास पर शुरू की थी। उनके बाद उनके पिता प्रमोद कुमार ने दुकान संभाली और अब वे भी पिता प्रमोद कुमार का दुकान पर हाथ बटाते हैं। रोहतक मे उन्होने घेवर की क्वालिटी पर विशेष जोर दिया। उन्होंने यहां सिर्फ देशी घी का ही घेवर तैयार किया जो आज भी उसी क्वालिटी मे मिलता है।

हालांकि जब विस्तार से इसके इतिहास के बारे में जानने की कोशिश की गई तो इसके बारे में कोई खास इतिहास मालूम नहीं हुआ। लेकिन घेवर को राजस्थान की उत्पत्ति मानी जाती है। इसके अलावा ब्रज क्षेत्रों में घेवर अलग-अलग तरीकों से बनाए जाते हैं। घेवर को इंग्लिश में हनीकॉम्ब डेटर्ट के नाम से जाना जाता है। तीज और रक्षाबंधन ये दो ऐसे त्योहार हैं जो घेवर के बिना अधूरे माने जाते हैं। राजस्थान में धूम-धाम से मनाई जाने वाली तीज में घेवर ही मिठास घोलता है। साथ ही ब्रज और उसके आस-पास के क्षेत्रों में एक परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन पर बहन घेवर लेकर भाई के घर जाती है। बिना घेवर के भाई-बहन का ये त्योहार पूरा नहीं होता। सामान्य तौर पर मैदे और अरारोट के घोल को तरह-तरह के सांचों में डालकर घेवर बनाया जाता है। समय के साथ-साथ घेवर को प्रेजेंट करने के तरीके में बदलाव आया है, लेकिन आज भी घेवर का स्वाद पुराना ही। नए घेवर के रूप में लोग मावा घेवर, मलाई घेवर और पनीर घेवर ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

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Panoromic 360 view of Bada Bazzar Market in old city.
Panoromic 360 view of new sweet market of Rohtak city.