Baje Bhagat
Sisana Sonipat
Facebook Share whatsapp Share

बाजे भगत का जीवन परिचय

बाजे भगत पंडित लख्मीचंद से पहले के सूर्य कवि और सांगी थे बाजे भगत अपने वचन के पक्के थे वह एक बार जिससे किसी बात को कह देते थे उसे पूरा करते थे बाजे भगत बहुत ही दयालु व्यक्ति थे उनकी हत्या करने वाले टेकचंद को भी उन्होंने माफ कर दिया और उसको वहां से भाग जाने के लिए कहा ताकि उसके परिवारजन उसे मार ना दे इसलिए उन्होंने टेकचंद को वहां से भगा दिया था उनके दिल में करुणा का भाव था बाजे भगत एक ऐसे कवि थे जिन्होंने महापुरुषों की जीवनी को अपने सांग के माध्यम से लोगों के सामने पेश किया था वह अपनी रागनियां के माध्यम से राजा हरिश्चंद्र, गोपी चंद्र जैसे महान राजाओं की जीवनी को दर्शाते थे |

...

बाजे भगत का जन्म जिला सोनीपत गांव सिसाना में 16 जुलाई 1898 को, विक्रमी संवत सावन मास में हुआ था इनके पिता का नाम ‘बदलूराम’ तथा माता का नाम ‘बदामो देवी’ था चार भाई-बहनों में बाजे राम तीसरे नंबर पर थे जिसमें उनकी बड़ी बहन हैरकोर और भाई शिव धन वह छोटी बहन धन्नो थी इनका विवाह कासडी निवासी श्री ‘सुंडू राम’ की पुत्री परमेश्वरी देवी से हुआ था जिनसे चार संतानों का पिता बनने का गौरव प्राप्त हुआ बाजे भगत का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक एवं कंठ अत्यंत मधुर था. बाजे भगत नियमित रूप से स्कूल पढ़ने नहीं गए थे अपने थोड़ी बहुत पढ़ाई इन्होंने खुद अपने माता पिता के प्रयास से संपन्न कि इन्होंने वर्णमाला की शिक्षा एक अध्यापक से प्राप्त की थी हिंदी भाषा का प्रारंभिक ज्ञान तथा देवनागरी लिपि का ज्ञान इन्होंने ईश्वर दत्त शास्त्री के सत्संग से प्राप्त किया इन्हीं के साथ रहकर बाजे भगत ने श्रीमद भगवत गीता, महाभारत, मनुस्मृति एवं उपनिषदों के अनेकों श्लोकों को कंठस्थ कर लिया था ईश्वर दत्त शास्त्री जी के संसर्ग से बाजे भगत में कविता लिखने और गाने बजाने के संस्कार जागृत हुए.

इसके बाद फिर अपने भीतर छुपे हुए ज्ञान को बाहर प्रकट करने के लिए अपनी गायन वादन एवं मंचन शैली को प्रभावशाली एवं चमत्कारी बनाने के लिए उनको एक गुरु की आवश्यकता थी 1 दिन बाजे भगत उस समय के एकमात्र प्रसिद्ध सांगी “स्वामी हरदेवा” के सांग कला की बारीकियां सीखने के लिए गए और उनको अपना गुरु धारण करके बाजे भगत ने उनके सामने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया इसी समर्पण के कारण वे एक आदर्श शिष्य कहलाए इनका भारतीय सनातन शिक्षा में पूर्ण विश्वास था कि गुरु मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को गुणवान बना सकता है बाजे भगत ने गुरु के बारे में लिखा भी है

सांगो में अभिनय के अलावा बाजे राम सामाजिक कार्यों में भी बहुत रूचि लेते थे भक्ति और धर्म में आस्था रखते हुए इन्होंने दान पुण्य के कार्यों को भी बड़े मनोयोग से किया और शायद यही कारण रहा कि वह बाजे भगत के नाम से विख्यात हुए इन्होंने लोक गायक और सांगी के रूप में लोक भावनाओं, आकांक्षा और अभिलाषा हृदयस्पर्शी भाषा प्रदान की थी जनसाधारण के हर्ष शोक पीड़ाओ, विशेषताओं, संवेदनाओ को छंद गीतों में डालकर मधुर कंठ से गाया तो श्रोता वर्ग मंत्रमुग्ध हो उठते थे इनके द्वारा रचित है लोक गीत, लोक धुनें, और लोकनाट्य आज भी संस्कृति प्रेमियों के हृदय पर राज करते हैं इनकी भाषा में माधुर्य और कोमलता के साथ-साथ हरियाणवी लोक भाषा का अभिनव रूप देखने को मिलता है |

बाजे भगत की रचनाएं



बाजे भगत ने लोक नाट्य परंपरा की न केवल नींव मजबूत की बल्कि इनका पोषण व सर्व धन करते हुए लोक साहित्य का एक अथाह भंडार भी छोड़ा है बाजे भगत अपनी रचनाओं में कहीं भी अश्लील शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे इन्होंने 15 के करीब सांगो की रचना की है सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, गोपीचंद, पूरणमल, अजीत सिंह, राजबाला, नल दमयंती, शंकुतला, दुष्यंत, कृष्ण जन्म, सरवर नीर ,ज्ञानी चोर,पद्मावत, हीरामल, जमाल ,रघुवीर धर्मकोर आदि . बाजे भगत की मृत्यु से कुछ दिन पूर्व गढ़ी निवासी टेका ने उनसे गढ़ी में सांग करने के कहा उन दिनों बाजे भगत जी ने गांव आसन में सॉन्ग करने की साईं ली हुई थी इसके बाद टेका जी ने भगत जी को अधिक रूपए का लालच दिया परंतु भगत जी अपने वचन पर प्रतिबंध थे भगत जी ने आसन गांव के बाद गढ़ी में सांग करने का आश्वासन देकर टेकचंद को मना कर दिया टेका ने इस बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर इसे अपना अपमान समझा तथा बाजे भगत जी की हत्या करने की ठान ली

बाजे भगत पर षड्यंत्र



इसके बाद टेकचंद ने एक रात सोते हुए बाजे भगत पर छूरे से प्रहार कर दिया पूरा पेट के ऊपरी भाग से लेकर जाग को पूरी तरह से चीरता हुआ चला गया गंभीर घायल अवस्था में भी अपने होश कायम रखते हुए अपने हमलावर को उन्होंने जब तक पकड़ कर रखा जब तक उनको पहचान नहीं गए इसके बाद हमलावर को पहचानने के बाद बाजे भगत ने उसे यह कहते हुए उसे वहां से भगा दिया कि तुम यहां से दूर चले जाओ अन्यथा मेरे परिवार जन एवं सहयोगी तुम्हें मौत के घाट उतार देंगे बाजे भगत की मृत्यु से ठीक 55 साल पहले ऐसा ही उदाहरण महान समाज सुधारक राष्ट्रीय नेता एवं दार्शनिक महर्षि दयानंद सरस्वती ने प्रस्तुत किया था जब उन्होंने अपने अत्यारे को रुपए देकर भगाया दिया था ताकि अनुयाई एवं शिष्य बदले की भावना के वश में हो कर उसका वध ना कर दे गंभीर घायल अवस्था में बाजे भगत को सिविल अस्पताल रोहतक लाया गया वहां उनके परिवार के सदस्यों मित्रों श्रद्धालुओं से पुलिस अधिकारियों द्वारा आक्रमणकारी का नाम बताने के लिए दबाव डाला गया बाजे भगत से एक पुलिसकर्मी ने कहा कि भगत जी एक बार मुझे अपने हत्यारे का नाम बता दो मैं उसे इस क्रूर अपराध का मजा चखा दूंगा इसके बाद भगत जी मुस्कुरा कर बोले साहब आप जैसा उच्च अधिकारी जब मुझे भगत जी कह रहा है तो मेरा भला कौन दुश्मन हो सकता है मैं कुछ नहीं जानता इस प्रकार अपने हत्यारे को क्षमा करके उन्होंने अपने भगत के स्वरूप को सिद्ध कर दिया ऐसा करके वे सच्चे अर्थों में संत एवं महा ऋषि यों की श्रेणी में आ गए |

बाजे भगत की मृत्यु



26 फरवरी 1939 फागुन चतुर्थी महाशिवरात्रि विक्रमी संवत को उन्होंने इस संसार से विदाई ले ली बाजे भगत एक भारतीय साहित्यकार कवि, रागनी लेखक, सॉन्ग कलाकार और हरियाणवी सांस्कृतिक कलाकार थे और कवि बाजे भगत जी सेन जाति के थे पूरे हरियाणा में कवि बाजे भगत के जैसा साहित्यकार कवि नहीं था हरियाणा में सबसे पहले पंडित लख्मीचंद और सेन बाजे भगत हुए दोनों ही कवि एक दूसरे का साथ देते थे यह दोनों बहुत ही सुंदर रागनी का गाते थे